कभी भागलपुर तो कभी गुजरात, कभी असम तो कभी दिल्ली, कभी मुजफ्फरनगर नगर तो कभी सहारनपुर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा के सारे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले माननीय दंगा जी से मैंने अपनी जान जोखिम में डाल के विस्तृत बातचीत की. माननीय दंगा जी ने अपने विचार बड़े बेबाकी से मेरे सामने रखे. प्रस्तुत है उस बातचीत के मुख्य अंश.

प्रश्न: आप कमोबेश देश के हर भाग में पाए जाते हैं, ऐसा क्यों?
उत्तर: देखिये वैसे कारण तो कई हैं, जैसे क्रिया की प्रतिक्रिया, धार्मिक कट्टरता और अफवाह आदि. लेकिन इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार देश हर कोने-कोने में पाए जाने वाला प्राणी है जिसे हम और आप नेता जी नेता जी कहते हैं.

प्रश्न: देखते ही देखते आप इतना उग्र रूप धारण क्यों कर लेते हैं?
उत्तर: देखिये ये हमें बदनाम करने की साजिश है, मैं उग्र होता नहीं हूँ बल्कि मुझे जबरदस्ती उग्र बनाया जाता है. जब हम छोटे स्तर पे होते हैं तो न पुलिस प्रशासन हमे सम्भालने आते हैं न ही सरकार की नजर हमारे तरफ होती हैं. कभी प्रशासन एकतरफा कार्रवाई करने लगती है तो कभी सरकार वोट बैंक के राजनीति को ध्यान में रखते हुए हमारी तरफ से नजरें मोड़ लेती है. इन सब का फायदा उठाते हुए नेता लोग हमे उकसाने लगते हैं, धर्म के ठेकेदार हमारे धार्मिक भावनाओं को आहत करवाने में लग जाते हैं. और इस तरह से हमें उग्र बना दिया जाता है.

प्रश्न: आपने अभी-अभी कहा है की नेता लोग आपको उकसाते हैं, वे ऐसा क्यों करते हैं?
उत्तर: भाई आप तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे आपको कुछ पता ही न हो की कैसे वे लोग हमे उकसा-उकसा के अपनी-अपनी वोट पक्की करने के जुगत में लगे रहते हैं. अरे मियाँ उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हमारे उग्र होने से कौन मरता है? वो तो बस इस बात से अन्दर ही अन्दर खुश हो रहे होते हैं की फलाँ वोट बैंक तो पक्का हो गया.

प्रश्न: आप इतना सब जानते हुए भी उग्र क्यों हो जाते हैं?
उत्तर: अरे भईया अब हम कैसे बताएं की जब हम छोटे रूप में होते हैं, उसी समय अगर प्रशासन हमें दो चमाट लगा के उचित कार्यवाही कर दे तो मेरे उग्र होने की नौबत ही न आए. लेकिन वे तो अपने आका के निर्देश पर उनके मनमुताबिक कार्यवाही करते हैं. जिसका फायदा नेता लोग उठाते हैं, उस समय हम भी गुस्से में होते है और उनके उकसावे में आ जाते हैं.

प्रश्न: लेकिन सभी राजनितिक दल और सरकारें आपकी निंदा करते हैं!
उत्तर: अरे बाबू, वो कहते हैं न की “हाथी के दिखाने के दांत कुछ और खाने के कुछ और होते हैं।” ये कहावत इन लोगों पर एकदम सटीक बैठती है. मैं तो ये दावे के साथ ये कहने को तैयार हूँ की अपने देश की कोई पार्टी या सरकार ऐसी नहीं है जो हमे उग्र होते नहीं देखना चाहती हो. तथाकथित सेक्युलर दल भी. ये लोग जो हैं न देश की जनता को उल्लू समझते हैं, बस.

प्रश्न: अक्सर ये सुनने में आता है की आप पे काबू पा लिया गया है. इस पर आप कुछ कहना कहेंगे?
उत्तर: अरे सब बकवास है, काबू पा लिया जाता है, लेकिन कब? जब मैं सैकड़ों-हजारों लोगों को मौत के घाट उतार चुका होता हूँ, हजारों लोगों को घायल कर चुका होता हूँ, लाखों लोगो को बेघर कर चुका होता हूँ, नेता लोग अपना उल्लू सीधा कर चुके होते हैं. अगर सरकार और प्रशसन हम पे काबू पाना ही चाहती है तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं करती है?

प्रश्न: आप इतने शक्तिशाली कैसे हो?
उत्तर: अपने सुना होगा न एकता में बल होता है, और ये भी सुना होगा हमारा देश अनेकता में एकता का मिसाल है.

प्रश्न: इस एकता अनेकता का आपके शक्तिशाली होने में क्या योगदान है?
उत्तर: देखो भाई, तुम एकदम सीधे-सादे बन रहे हो. जब सारे लोग मसलन पुलिस-प्रशासन , सरकार, धार्मिक गुरु आदि एक होकर हमें उग्र होने का शक्ति प्रदान करते हैं, तो हम शक्तिशाली होंगे ही न! और अलग-अलग विचारधारा वाले दलों मसलन समाजवादी, वामपंथी, धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी आदि के लोग अनेकता में एकता का परिचय देते हुए हमे सामूहिक रूप से उग्रता प्रदान करते हैं. और हमारे मनोबल बढ़ाने का काम करते हैं. इन्ही कारणों से हम इतने शक्तिशाली हो जाते हैं.

प्रश्न: कुछ भी हो सर , आप प्रसिद्ध बहुत हो. इसका कोई राज?
उत्तर: अरे, मियाँ ये बात आप से अच्छा और कौन जान सकता है!

प्रश्न: म.. म.. मेरे से अच्छा का मतलब?
उत्तर: हमें प्रसिद्धि दिलाने में आप मीडिया वालों का सबसे ज्यादा योगदान होता है. आप दिन-रात इकठ्ठा कर के हमारे कारगुजारियों को मिर्च-मसाला लगा के देश दुनिया तक पहुँचाने का काम करते हो. मेरा ज्यादा चर्चा करने से आपका TRP जो बढ़ जाता है. एक कहावत है न “अपना काम बनता भाड़ में जाए जनता”, चाहे इससे किसी को फायदा हो या नुकसान आपको तो रायता फैलाने (TRP बढ़ाने) से मतलब है.

ये सुनाने के बाद मैं अपना झोला वैगेरा सम्भाला और वहां से निकल लेने में ही अपनी भलाई समझा.
अमित सिंह

Tags: Danga, Politics

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