जी | अब हम बोलेंगे | हम बोलने के लिए खड़े हुए हैं | तो हम बोलेंगे | हम प्रशन करने के लिए खड़े हुए हैं तो हम प्रश्न करेंगे ही | आपको अच्छा लगे, आपको अच्छा न लगे, इससे हमें फर्क नहीं पड़ता लेकिन जब तक हमारे क्षेत्र में भूख-कुपोषण, गरीबी, भुखमरी, पलायन, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार खत्म नहीं होती तब तक हम बोलेंगे | यह वक्त का तकाजा है जब हम अपने साथियों को भी कहेंगे कि आप भी बोलिए | आप भी प्रश्न करिए | जी हाँ खुलकर सीना ठोककर प्रश्न कीजिए |

 

                                                    विद्यापति समारोह करने से मिथिला को क्या फायदा होता है ? अगर मिथिला को नहीं फायदा होता है तब करोड़ों रुपए पानी में फेकने का  क्या फायदा ? नौजवानों हम कर क्या रहें हैं ? हम पूछ रहें हैं आपसे विद्यापति समारोह में विकास की बात क्यों नहीं होती ? चलो मान लिया सांस्कृतिक समारोह है, मान लिया सांस्कृतिक कार्यक्रम आज तक ऐसा ही होता आया है, विद्यापति समारोह में कभी विकास की बात नहीं हुई है, लेकिन अब हमें बदलना पड़ेगा | हर विद्यापति समारोह में मिथिला के विकास चर्चा करनी होगी आधे घंटे के लिये ही सही | यह मिथिला के लाखो नौजवानों की मांग है, यह मांग जब तक पूरा नहीं होगा तब तक हम से पीछे नहीं हटने वाले |

 

                 साथियों प्रश्न यह है कि दिल्ली मुंबई में रहने वाले लोगों का पेट भरा हुआ है | तो फिर मिथिला की विकास की बात उनके लिये बेमानी हो जाती है लेकिन हम तो प्रशन करेंगे | हमारा अधिकार है कि हम उन्हें मजबूर करें विकास की बात करने को | उनकी ये जिम्मेवारी है, क्योंकि इसी मैथिल समाज के बल पर ही तो वो भी आगे बढ़े हैं | इसी समाज ने उन्हें आगे बढाया है, और ये वक्त का तकाजा है कि वो अपने मैथिल समाज के लिए कुछ काम करें | जी हाँ विकास की बात करें, लाखो लोगों का पेट भरने की बात करें, रोजगार लाने की बात करें, गरीबी मिटाने की बात करें ताकि मैथिल समाज अपनी खोई वैभव को पुनः प्राप्त कर सके और और करोड़ो मैथिल का मान सम्मान बढ़ सके |   

(लेखक - एक बेरोजगार मैथिल नौजवान)

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