बात उस वक़्त की है जब मेरे १२वीं के एग्जाम हो चुके थे। घर में खाली बैठा था तो आईडिया कंपनी में एक पार्ट टाइम जॉब ज्वाइन कर लिया था। जून का महीना था।  हमारे रायपुर में उस  वक़्त काफ़ी धुप होती है। इसलिए लंच करने जब घर जाता तो थोड़ा देर आराम कर लिया करता।  

उस दिन मैं लंच कर के वापिस ऑफिस पहुंचा तो मेरे बॉस ने मुझे कुछ काम से, किसी पैकर्स एंड मूवर्स के पास जाने बोला। एक पर्ची पर उसका पता लिख कर मेरे हाथ में थमा दी और  कहने लगे कि "यहीं पास में ही है शंकर नगर,जल्दी से जा कर बात कर लो और काम खत्म कर आओ " । 

शंकर नगर सुनते ही कुछ पल के लिए मैं कहीं खो सा गया। उन कुछ पलो में पूरा ११-१२वीं का फ्लैशबैक हो गया और मुझे याद आया कि उसका घर भी तो शंकर नगर में ही है। फिर मैंने अपना बैग उठाया और अपनी साइकिल लेकर ऑफिस से निकल गया। साइकिल चलाते-चलाते मेरे दिमाग में अपने स्कूल की ही बाते घूम रही थी।  हमारा किसी बात पर झगड़ा हुआ था। और २ महीने से हमारी बात बंद थीं। मुझे ये तो याद था कि उसका घर शंकर à¤¨à¤—र में है।  पर कौन सा घर है शंकर  नगर में कहा है वो नहीं पता था। और यही सब स्कूल की बातें सोचते - सोचते मैं शंकर नगर पहुंच गया। और पर्ची पर लिखे पते  को ढूंढने लगा। इस गली से उस गली घूमता रहा पर वो एड्रेस मुझे मिला नहीं या शायद मैं ठीक से ढूंढ नहीं रहा था। और सोच रहा था कि शायद इस एड्रेस को  ढूंढते - ढूंढते मुझे वो कहीं दिख जाये। खुद से कह रहा था,"अच्छा हुआ इस गली में भी नहीं मिला। अब मुझे दूसरी गली में जाने का मौका मिलेगा और शायद उस गली में कहीं वो दिख जाये। और ऐसे ही दिल और दिमाग में एक बहस सी छिड़ गई।

दिमाग बोल रहा था :  "भाई थोड़ा अच्छे  से एड्रेस ढूंढ़  ले" और

दिल बोल रहा था " अच्छा है नहीं मिल रहा "।मिल गया तो दूसरी गली में कैसे जायेगा।

दिमाग : वाह बेटा ! मतलब कुछ भी। जिस काम से आये थे वो कर लो पहले।

दिल : वो तो हो जायेगा।  बस वो एक बार दिख जाती तो बस फ़िर। 

दिमाग : हाँ  बेटा वो तो इतने धुप में तुम्हारे लिए बाहर घूम रही होगी ना ,जो तुम्हें दिख जायेगी।

दिल :हाँ हो सकता है ,कुछ लेने बाहर आई हो या हो सकता है कि मैं उसके घर के सामने से निकलूँ  और वो बाहर खड़ी हो। 

दिमाग :पगला गए हो क्या? ये कोई तुम्हारी  फिल्म थोड़ी है , जो तुम वहाँ से निकलो और वो उसी समय अपनी बालकनी में आये।

दिल : नहीं वैसा नहीं है ,पर हो भी तो सकता है। 

दिमाग :देखो भाई ! ना मूवी की शूटिंग चल रही है,ना तुम हीरो हो ,ना ऐसा कुछ होने वाला है ,ऐसा फिल्मो में ही होता है।

दिल : हाँ वो सब तो ठीक तक है पर शायद। शायद वो कहीं दिख जाये।

इन दोनों की बहस के  साथ मैं अपने होठों पर छोटी सी मुस्कुराहट लिए,अपनी साइकिल लहराता हुआ एक गली से दूसरी गली उस एड्रेस को ढूंढ़ रहा था और हर घर की बालकनी में देखता हुआ जा रहा था कि शायद वो कहीं दिख  जाए। एक गली में घुसा ही था कि अचानक से धूप चली गई और बादल से छा गए। और ये देखते ही

दिल : यार कुछ तो हो रहा है ,एकदम से ऐसा मौसम । अब तो पक्का चांस है। कुछ तो होगा

दिमाग  :पागल ही हो गए हो तुम बेटा , ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।

बादल तक तो ठीक था पर फिर मेरे बाएँ हाथ पर पानी की एक छोटी सी बूँद गिरी। पुरे शरीर में जैसे एक करंट सा दौड़ गया और रोंगटे खड़े हो गए।फिर डिज़्ज़ेलिंग शुरु हो गई । चेहरे पर छोटी - छोटी, ठंड़ी - ठंडी बूँदे पड़  रही थी और बाल हवा  में लहरा रहे थे। मैं खड़े होकर साइकिल का पैडल मार रहा था। कहाँ तपती हुई धूप थी और कहाँ कुछ ही पलो मे सब बदल सा गया था। और फिर दाएं ओर से एक हवा का झोका आता है और मेरी नज़र बाए तरफ ४५ डिग्री के एंगल से "उसपर" पड़ी। और बस तब तक तो सब रुक चुका था। नीचे एक किराने की दुकान थी और उसके ऊपर फर्स्ट फ्लोर की बालकनी, जहाँ पर  तीन गमले रखे हुए थे,वहाँ "वो" ,हवा से अपने चेहरे पर आई ज़ुल्फो को उंगलियों  से हटा कर अपने कानों के पीछे खोस रही थी । सफ़ेद रंग का कुर्ता  और बैंगनी  चुन्नी, जो की  हवा से उसके एक कंधे से सरक गई थी, उसे उठा कर उसने वापस अपनी जगह पर रखा था। उसके साथ ही बैकग्राउंड में "पहला नशा" का  म्यूजिक शुरू होता है  टिंग टिड़िंग। ...आह !! मुझे बारिश की  एक-एक बूँद अलग-अलग दिखाई दे रही थी ,पेड़ कैसे हिल रहे थे ,उसमे से कौन सा पत्ता टूट कर नीचे कहा गिर रहा था सब पता चल रहा था। मै,मेरी साइकिल ,सड़क पर जाने वाले लोग,गाड़ियाँ , सब रूक गया था ,बस एक ही चीज़ नहीं रुकी थी वो थी मेरी धडकन "धक -धक", दिल को धड़कते तो सुना था पर देख पहली बार रहा था।  ये सब ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने एक- एक चीज़ को उस पल में बड़ी ही बारीकी  से डाल कर एक खुबसूरत पेंटिंग बनाई हो। ये सब कितने सेकंड चला ,ये तो मुझे पता नहीं पर उस वक़्त मेरी दुनिया रूक सी गई थी या शायद स्लो मोशन में चल रही थी। हक़ीक़त से जब रूबरू हुआ तो पता चला  कि मेरी साइकिल किनारे जा कर रुकी है , क्योंकि जितनी चाबी मैंने साइकिल में  पैडल से भरी थी अब वो खत्म  हो चुकी थी। होश संभाला तो ,यकीन नहीं हो रहा था कि ये जो भी अभी कुछ सेकंड पहले हुआ वो सच था या मेरा वहम ।  क्योंकि ऐसा  तो फिल्मो में होते देखा है।  जब आप उसके गली से निकलो तो वो बालकनी में कपड़े या अपने  बाल सुखा रही होती है। और अब कहाँ कौन सा एड्रेस कौन सा पैकर्स एंड मूवर्स कुछ याद नहीं था। फिर खुद से बोला "जो भी था अच्छा था " और अपने चेहरे पर चार इंच की स्माइल लिए मैं साइकिल चलाते हुए इस डर से  ऑफिस निकल गया कि कही "वो" मुझे देख ना ले ।अब मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि  मैंने  उसे सही में देखा है या फिर  जो दिल और दिमाग की बहस चल रही थी ये उसका असर था।  वही ४  इंच की स्माइल चहरे पर लिए ऑफिस वापिस पहुंचा बिना वो एड्रेस ढूंढे। और ऑफिस से काम खत्म कर ,वही स्माइल लिए अपनी साइकिल पर वही स्माइल से  घर निकल गया। उस दिन के बाद भी मैं इसी असमंजस में था कि उस दिन जो हुआ वो सच था या मेरी कल्पना थी। क्या पता वो उसका घर ही न हो ,क्या पता जिसको मेने देखा वो कोई और लड़की हो। क़रीब ७-८ महीनो बाद उससे मिला तो सोचा पूछ लूँ उससे कि तुम्हारा घर कहाँ पर है।  कम से कम मेरी शंका तो दूर होगी। और जब मैंने उससे पूछा , तो पता चला ,वो उसका ही घर था। तब यकीन आया, जो उस दिन हुआ वो कोई फिल्म की शूटिंग नहीं थी न कोई सपना ,ना कल्पना। सच था। हमारी फिल्मों की तरह हमारी ज़िन्दगी भी खुबसूरत है ।अब मैं बैंगलोर में रहता हूँ , पर जब भी घर जाना होता है तो एक बार उस गली से ज़रूर निकलता हूँ कि शायद फिर से वो दिख जाये।

 

"वहाँ आज भी सब कुछ वैसा ही है वहीं  फर्स्ट फ्लोर की बालकनी पर ३ गमले रखे हुए हैं और नीचे एक किराने की दुकान है.....हवा भी वैसे ही चलती है  फर्क सिर्फ इतना है कि अब  "तुम"  वहाँ नहीं हो और हवा का फील थोड़ा कम आता है क्योंकि अब मेरे  बाल पहले से काफी कम हो गए हैं । “

 

 

अगली बार फिर घर जाऊंगा तो उस गली से एक बार फिर निकलूँगा इस उम्मीद में कि "शायद कहीं वो दिख जाये"। अभी जो भी मैंने आपको बताया वो इससे कहीं ज़्याद खुबसूरत था जो शायद शब्दों में कभी बयाँ नहीं किया जा सकता। क्योंकि कुछ एहसास सिर्फ एहसास ही होते है उन्हें अल्फाज़ो में बयाँ नहीं कर सकते।

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